क्या आप भी 'दिखावे' के चक्कर में अपनी सैलरी उड़ा रहे हैं?

 यार, ये लकी भास्कर वाला सीन सिर्फ़ फ़िल्म की कहानी नहीं है, ये तो अपनी लाइफ की लाइव रिकॉर्डिंग है। सच कहूँ तो, 25 से 35 की उम्र में ये सब सबसे ज़्यादा होता है।




असली स्कैम: हमारा अपना ईगो और FOMO

Let's be real, अपनी इस उम्र में दिखावा हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन जाता है। दोस्त ने नई कार ली, तो हमें भी चाहिए। Instagram पर किसी को विदेश में छुट्टियां मनाते देखा, तो हमें भी उसी vibe में जाना है। हमें लगता है कि अगर हमारे पास भी वो चीज़ें नहीं हुईं, तो हम पीछे रह जाएँगे। और यही है असली स्कैम।

इसे कहते हैं Ego-Driven Spending यानी अहम्-प्रेरित ख़रीदारी। और इसका दूसरा नाम है FOMO – Fear of Missing Out

उस ज्वेलरी शॉप के मालिक ने कुछ ख़ास नहीं किया। उसने बस भास्कर की असुरक्षा को ट्रिगर किया और लाखों का प्रॉडक्ट बेच दिया। उसने भास्कर के मन में ये डर भर दिया कि वो बाकियों से कम है। और इस डर को ख़त्म करने के लिए भास्कर ने वो सब किया जो उसकी ज़रूरत ही नहीं थी।

आज हम भी यही करते हैं। हम अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा सिर्फ़ इसलिए खर्च कर देते हैं ताकि हम दूसरों की नज़रों में 'लगज़री लाइफ' जी सकें। वो एक नया iPhone, वो ब्रैंडेड कपड़े, या वो एक्सपेंसिव वेकेशन— ये सब हमारी ज़रूरत नहीं, बल्कि हमारे ईगो की डिमांड होती है।


अगली बार जब कुछ ख़रीदो, तो ये सोचना

याद रखो, सबसे अमीर इंसान वो नहीं जिसके पास सबसे महंगी चीज़ें हैं, बल्कि वो है जिसके पास अपने मन की शांति है और वो दिखावे के चक्कर में नहीं पड़ता।

तो अगली बार जब तुम क्रेडिट कार्ड स्वाइप करने वाले हो, तो एक सेकंड रुककर सोचना:

"क्या मैं यह चीज़ इसलिए ख़रीद रहा हूँ क्योंकि मुझे इसकी ज़रूरत है, या सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मुझे किसी को कुछ साबित करना है?"

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